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मिशन दिल्ली फतह

 किसान आंदोलन की पृष्ठभूमि में पंजाब में चुनाव हुए। दिल्ली की तर्ज पर पंजाब में भी फ्री की रेवङियों का पिटारा खोला गया। तो किसान, माइनोरिटी एवं दलित वोट आप को मिले और पंजाब में आप की सरकार बनी। चूंकि हरियाणा भी दिल्ली और पंजाब से जुङा हुआ और यहां भी किसान तो आप ने यहां भी सत्ता के लिए सपना पाला। हरियाणा में दो टर्म से लगातार भाजपा थी जिससे एंटी इंकम्बेक्सी थी तो कांग्रेस को पूरा यकीन था कि वह हरियाणा में वापसी कर सकती है और युवराज के खाते में एक उपलब्धि दिखा सकती है पर घाघ केजरीवाल ने सारे पर पानी फेर दिया। पंजाब जीत से केजरीवाल उत्साहित था तो लोकसभा में अच्छे प्रदर्शन से कांग्रेस। दरअसल लोकसभा चुनाव में इंडी गठबंधन का सबसे ज्यादा फायदा कांग्रेस को मिला ऐसे में दिल्ली आंदोलनों का लाभ केजरीवाल कांग्रेस को देना नहीं चाहते थे और नूरा कुश्ती में हरियाणा में भाजपा तीसरी बार काबिज हो गई। हरियाणा की वापसी ने मूल ओबीसी की बांछे खिला दी। पूरे देश का मूल ओबीसी आज भाजपा के पक्ष में खङा है।  हरियाणा हार ने कांग्रेस को बहुत गम दिए। शाहजादे की पैदल यात्रा का जादू उतर गया। झारखंड में जीत नही...

मकराना नगर परिषद का हुआ सीमा विस्तार

 शहर जब बढता है तब पहले उसका खुदका रकबा आबादी में तब्दील होता है फिर सङकों के किनारे किनारे आस पास के गांवों की जमीन पर पसरता है। बात करें अपने शहर मकराना की तो डायमंड से चिराई शुरू होने के बाद बोरावड़ रोङ और बाईपास रोड से लगी जमीने वाणिज्यिक प्रयोजनार्थ बदली और शहर के पश्चिम में बालाजी कालोनी व झंवर कालोनी डवलप हुई। दक्षिण में बाईपास से सटकर भाटीपुरा तो गांगवा रोङ के आजू-बाजू लोहारपुरा, गायत्री नगर और ओम कालोनी डवलप हुई। मंगलाना रोङ पर सुभाष नगर, देशवाली ढाणी, आनंद नगर, गायत्री नगर और वसुंधरा नगर बसे। उपखंड कार्यालय बाहर आने के बाद गुर्जर कालोनी और तहसील कालोनी बसी। पलाङा रोङ पर बङी कालोनी बसी तो जूसरी रोङ पर मालियों की ढाणी। शहर के उत्तर में भाखरों की ढाणी, हनुमान जी की ढाणी और मींडकिया रोङ पर न्यू गुर्जर कालोनी तो पूरी माताभर रोङ कालोनियों में बदल गई। इस क्षेत्र में जबसे कालवा बाईपास निकली है सङक और शहर के बीच बसने की होङ मची हुई है। सबसे पहले बसे भाटीपुरा, लोहारपुरा, आनंद नगर और वसुंधरा नगर वाले मकराना से जुड़े होने के बावजूद प्रशासनिक इकाई के तौर पर जूसरी और दिलढाणी ग्राम पंचा...

राइजिंग राजस्थान -ग्लोबल इंवेस्टमेंट सम्मिट

 किसी भी पार्टी में तीन तरह के कार्यकर्ता होते हैं। एक वे जो यह तय करते हैं कि इस बार कौन खड़ा होगा, दूसरे वे जो इन लीडर्स के साथ रहते हैं और तीसरे वे जो पार्टी को जरूरत पड़ने पर अवैतनिक अपनी हाजिरी देते हैं। एक साल पूर्व जब नैतृत्व ने माननीय भजन लाल को मुख्यमंत्री घोषित किया तो यह तीसरा वर्ग पता नहीं क्यूं असहज था। ग्रास रूट का कार्यकर्ता जो ग्रामीण क्षैत्र से है फिर भी यह तीसरी जमात उस वक्त 'भजन करो- भजन करो' बोल कर झेंपते थे। नेताओं के खास अर्दली रहे लोग तक कह रहे थे कि यह ज्यादा दिन नहीं चलेगा। आप क्या समझते हैं कि कल से जो 'राइजिंग राजस्थान ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट' हो रही है उसके पीछे पहली बार विधायक बने किसी व्यक्ति का दिमाग है? पूरा संगठन साथ है तभी तो माननीय नरेन्द्र मोदी जी उद्घाटन समारोह में आ रहे हैं। नो से ग्यारह यह बहुत बड़ा आयोजन जिसमें तीस से ज्यादा तो बङे उद्योगों के मालिक और सीईओ, बाईस से अधिक देशों के प्रतिनिधि मंडल और पांच हजार से अधिक व्यापारिक संगठनों के लोग होंगे: उसके बाद बारह से प्रथम वर्षगांठ! फिर मोदी आएंगे ईआरसीपी के उद्घाटन में!  आप ने अब तक ...

उप चुनाव परिणाम

 मैंने अपने एक नवंबर के ब्लॉग में झुंझुनूं से कांग्रेस, खींवसर से आरएलपी व चौरासी से बाप व शेष चार सीटें भाजपा को दी थी। मेरे विश्लेषण में खींवसर, झुंझुनूं व दौसा में उलटफेर हुआ और भाजपा की एक सीट बढी। मैंने अपने ब्लॉग में नतीजों के असर पर भी कयासबाजी की थी। निस्संदेह इन चुनावों में भाजपा के लिए पाने के ही अवसर थे क्योंकि प्रदेश में उपचुनाव में सत्ताधारी दल के साथ कनेक्ट रहने का ट्रेंड रहा है। जिन दो सीटों पर हारी है उनमें दौसा ने चौंकाया है। बैरवा कोई हाई प्रोफाइल नेता नहीं है, मात्र प्रधान रहे हैं वहीं भाजपा से किरोड़ी लाल मीणा ही उम्मीदवार थे। बाबा कांग्रेस सरकार में लङाकू रहे तो अपने आप को सीएम ही मान रहे थे। पिछले काफी दिनों से इस्तीफा दिए घूम रहे थे। विपक्ष के पास यह बङा मुद्दा था। इन चुनावों में भाजपा ने बाबा का जाप्ता कर ही दिया। बाबा अब भी चूं चपड़ करते हैं तो अगले चुनाव में इनका भी डोरा तै। अब सवाल उठता है कि बाबा की हार में फेक्टर क्या रहा? क्या गुर्जर मतदाताओं ने पायलट का साथ दिया? क्या सामान्य वर्ग के मतदाता सामान्य सीट होने के बावजूद एसटी वर्ग को टिकट दिए जाने से नारा...

01 November 2024

 चुनाव की आहट होते ही हम राजनैतिक पंडितों के पेट में ज्ञान के मरोङे उठने शुरू हो जाते हैं। पहले तो टिकटों को लेकर हम कयास लगाते हैं, फिर कौन जीतेगा उस पर गणित बैठाते हैं। भले ही हमें हमारे मौहल्ला में भाव नहीं मिलता हो पर पूरे देश की गणित हमें मुंह जबानी होती है। उप चुनाव है तो विश्लेषण वाला बुखार हमें भी आया पर क्यूं किसी की दिवाली खराब करें तो आज रामा श्यामा पर हाजिर हुआ हूं। पहले तो आप सभी सुधि स्वजनों को दिपावली पर्व की बहुत बहुत शुभकामनाएं, अभिनंदन एवं सादर यथा योग्य अभिवादन! इन चुनावों में भाजपा को खोने के लिए कुछ नहीं है। सिर्फ सलूंबर से भाजपा के विधायक के निधन से उप चुनाव है। शेष छहों सीटों में रोत व बेनीवाल सांसद बन गए। रामगढ़ से कांग्रेस विधायक के निधन से उपचुनाव है बाकी झुंझुनूं, दौसा व देवली उनियारा से जीते कांग्रेस विधायक सांसद बन गए तो उप चुनाव हो रहे हैं। राजस्थान में यह ट्रेंड रहा है कि उप चुनाव में मतदाता सत्ता के साथ रहते आए हैं तो फायदा भाजपा को मिलना तय है। सलूंबर से सहानुभूति कार्ड खेला गया है तो सलूंबर भाजपा को तय! दो जाट एमएलए एमपी बन गए तो इन दोनों पर जाट ही...

कैसे हो रही कांग्रेस की दुर्गति

 आप अपने आप को कांग्रेस का राष्ट्रीय अध्यक्ष समझते हुए दैनिक राष्ट्रदूत की यह रिपोर्ट पढ़ें। आप को लगेगा कि राजस्थान की जनता कितनी पागल है जो आपको लोकसभा चुनाव में आपकी अपेक्षा से कितनी अधिक सीटें आपको दे दी। कांग्रेस में कभी विधानसभा चुनाव के लिए टिकट सांसद तय किया करते थे, आज आपके गठबंधन के सांसद न सिर्फ अपने अपने क्षेत्र में अपितु सलूंबर और देवली उनियारा में आपकी हवा खराब कर रखी है। लोकसभा चुनाव में आपको जरूरत थी तो आपने तीन सीटें छोड़ दी और वे जीत भी गए पर आप उनको सम्मान नहीं दे पाए, न ही उनका दिल जीत पाए। अब इंडिया में गठबंधन है प्रदेश में प्रतिद्वंद्वी है। यह कैसा बेमेल गठबंधन हुआ? बेनीवाल और रोत ने सात में से चार सीटों पर चुनाव त्रिकोणीय कर दिया है। झुंझुनूं में गुढ़ा त्रिकोण बना चुके हैं। दौसा में बाबा की तूती बोलती है तो रामगढ़ हरियाणा का पङौसी है। ऊपर से भाजपा सत्ता में है और प्रदेश का ट्रेंड उपचुनाव में सत्ताधारी पार्टी के साथ रहने का रहा है। तो सिफर बट्टा सन्नाटा की स्थिति बनी हुई है। अब आपके सामने तीन सवाल है। पहला ऐसी स्थिति हुई क्यों? दूसरा, यदि रिजल्ट ऐसा ही रहा तो?...
 करीब 04 लाख छात्र ढाका की सङकों पर थे। लक्ष्य था प्रधानमंत्री शेख हसीना के आवास का घेराव। बंगलादेश के संस्थापक शेख मुजीबुर रहमान की पुत्री पिछले 15 सालों से प्रधानमंत्री थीं। अभी 8 माह पूर्व ही शानदार जीत के साथ पुनः प्रधानमंत्री बनी थी लेकिन आरक्षण पर दो महीने पूर्व आए फैसले से छात्र भङक गए और आंदोलन पर उतर आए। बंगलादेश में 56 प्रतिशत आरक्षण था जिसे 2018 में शेख हसीना ने ही हटाया था। सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण को घटाकर 6 प्रतिशत कर दिया था लेकिन अब आंदोलन शायद छात्रों के हाथ से निकल गया और शेख हसीना के पद त्याग की मांग शुरू हो गई। किसी देश की सेना दुश्मन से व उग्रवादियों से तो लङ सकती है पर अपने नागरिकों से नहीं तो 05 अगस्त को जब भीङ ने प्रधानमंत्री आवास की और कूच किया तो सेना के दवाब में प्रधानमंत्री को देश छोङना पङा और दो साल पूर्व श्रीलंका की तरह की तस्वीरें सामने आई जिनमें प्रधानमंत्री आवास में आंदोलनकारी फोटो खींचा रहे हैं, खाना खा रहे हैं और आवास से लट्टू, पंखा, कुर्सियां, बतख व मछली लूट रहे हैं। श्रीलंका व बंगलादेश की दोनों घटनाओं में समानता यह रही कि दोनों आंदोलनों को किसी र...

बदहाल हुई सफाई व्यवस्था

 2007 की बात है। बरसात के दिन थे। मकराना में बच्चों में एक वायरल बीमारी फैली जिससे तीन बच्चों की मौत हो गई। तब भी मकराना में सफाई व्यवस्था बिगड़ी हुई थी और वर्तमान डंपिंग यार्ड नहीं था। समस्या यह भी आई कि कचरे को कहां डालें। तब हमारे एक समाज ब़धु (स्वामी) ने अपना खेत उपलब्ध कराया था जहां कचरे को जमीन में गाड़ा गया। सफाई कर्मचारियों की हङताल के चलते पूरे राजस्थान में सफाई व्यवस्था गङबङाई हुई है। चूंकि सफाई कार्य एक जाति विशेष ही कर रहा है तो वैकल्पिक व्यवस्था भी नहीं बैठ पा रही। ऐसे में हम आम जनता का भी फ़र्ज़ बनता है कि कचरा सङक पर नहीं डालें। और आम जनता अपने इस फर्ज पर पूरी उतर भी रही है। कल भास्कर में इस समाचार के प्रकाशन के बाद मैंने अपने आवास गुणावती से माताभर फूलजी बावरी के मकान तक का नीरिक्षण किया। फूल जी बावरी के मकान से बंशी हलवाई की दुकान तक कहीं भी कचरा नहीं है। नाकौङा के शोरूम से जयशिव चौक, एलएमबी चौराहा, आरओबी, घाटी चौराहा और गुनावती तक कहीं भी कचरा डाला हुआ नहीं है। कचरा है तो सब्जी मंडी से लेकर बाजार वाली चक्की तक है। यह कचरा व्यापारियों द्वारा फैलाया हुआ है।  व्...

करमा बाई पैनोरमा

 याद कीजिए कैसे गहलोत ने अपने अन्तिम बजट की ब्रांडिंग की थी! वो चुनावी साल थी लेकिन हमारे भजन लाल शर्मा जी ने तो पहले ही बजट में वाह-वाह कर दी, कसर रही तो बजट भाषण के प्रतिउत्तर में पूरी कर दी। शर्मा जी ने हमारी मकराना तहसील के कालवा ग्राम में भक्त शिरोमणि करमा बाई जी पर पैनोरमा बनाने की घोषणा की है। हमारे चार धामों में एक है पुरी! वहां भगवान जगन्नाथ के जो बालभोग बनता है वह रसोई करमा बाई के नाम पर है। रथयात्रा में भी करमा बाई की मूर्ति बिराजती है। जहां जहां राजस्थानी है, वहां भजन संध्याओं में 'खाले खींचङलो' जरुर गाया जाता है। नागौर जतियों, सतियों, वीरों, कवियों और संतों- भक्तों की धरा रही है। यहां चार भक्तिमतियां हुई है - मीराबाई, करमा बाई, राना बाई और फूलांबाई। इनमें मीरा बाई और कर्मा बाई सशरीर भगवान में समाई है। एक द्वारिका पुरी में तो दूसरी जगन्नाथ पुरी में।  एक भजन है - जग म नांव कमायो ये मीरा मेङतङी। लेकिन करमा बाई ने तो पूरे जगत में कालवा ग्राम का नाम चमकाया है। डूडी जाट परिवार की इस लाडली की यशोगाथा पूरे भारत में गाई जाती है - भक्ति हो तो करमा जैसी, श्याम खींचङो खायो है...

हलवा सेरेमनी

 संवैधानिक संस्थाएं संविधान से संचालित होती है। देश चलाने वाले अधिकारी यूपीएससी से चयनित होकर आते हैं। यूपीएससी अपनी भर्तियां संविधान में दिए आरक्षण के अनुरूप करती है।  अधिकारी का चयन और नेता का चुनाव हो जाने के बाद वह किसी जाति विशेष का नहीं रह जाता। उसे संविधान के अनुरूप काम करना होता है, ऐसे में बजट की हलवा सेरेमनी में अफसरों को जाति से पहचाना जाना कितना उचित है? सोशल मीडिया पर एक होती है ट्रोल सेना। ट्रोलिंग में कई बार नैरेटिव गढे जाते हैं, लेकिन कांग्रेस के राजकुमार का सनातन विरोध जग जाहिर है। हाल ही में उन्होंने संसद में कहा कि हिंदुत्व वाले हिंसक है। नेता प्रतिपक्ष के रूप में सोमवार को बजट पर संसद में बोलते हुए उन्होंने एक तस्वीर लहराते हुए पूछा कि यह हलवा किसमे बंटा, हलवा बनाता कौन है? चीन से नजदीकी रखने वाले और टुकड़े - टुकड़े गेंग के सरपरस्त बने लोग यह भूल जाते हैं कि अधिकारियों का चयन यूपीएससी करती है और मोदी के 10 व अटल जी के 5 साल निकाल दें तो बाकी राज तो कांग्रेस का ही रहा है। संवैधानिक संस्थाओं और उनके रीवाजों पर अंगुली उठाने पर वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने श...

राष्ट्रीय जनसंख्या नियंत्रण पखवाड़ा

 1999-2000 की बात है। बढ़ती जनसंख्या को लेकर मैंने एक लेख लिखा था -"मानवाधिकार से बढ़कर जीवनाधिकार का मामला"। तब मैं एनजीओ सेक्टर से जुङा हुआ था और सर्वोदय की युवा विंग राष्ट्रीय युवा संगठन का राजस्थान प्रदेश संयोजक था। जन आंदोलनों के राष्ट्रीय समन्वय के मुख पत्र "नई आजादी " ने लेख को छापा। उस लेख ने मुझे युवा गांधीवादी विचारकों की श्रेणी में ला दिया था। यह बात अलग है कि लेख लेखन से पूर्व ही एक पुत्र और एक पुत्री के जन्म के बाद मेरी पत्नी ने बच्चाबंदी का आपरेशन करा लिया था। लेख में मैंने जनाधिक्य का पक्ष लेते हुए लिखा था कि कैसा समय आ गया है कि हम अर्थव्यवस्था के एक मजबूत अंग श्रम-मानव को समस्या समझ बैठे हैं। यह वो समय था जब वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए अंतरराष्ट्रीय व्यापार की अनिवार्यता को लेकर डंकल ड्राफ्ट पास हो गया था। विश्व व्यापार खुले करने को लेकर यूएनओ मुहिम छेङे हुए था। तब हम वैश्विक व्यापार के खिलाफ में थे। आज 25 वर्ष बाद हमने बहुत कुछ सीखा है। ग्लोबलाइजेशन व खुलेपन से आई खुशहाली हम परंपरागत तरीके से 65 वर्षों तक तो ला नहीं पाए। पर व्यापक वैश्विक परिवर्तन ...

ठाकुर का कुआ

 मकराना से कुचामन वाया जूसरी जाते हैं तो कुचामन से पहले गढनुमा कई इमारतें आती हैं। ये इमारतें ठाकुरों की नहीं है। कुचामन मार्केट में आटोमोबाइल सेक्टर पर भी ठाकुर नहीं है। यहां चुनाव होने के बाद से एमएलए-एमपी भी ठाकुर नहीं है। यहां पर्वतों पर बना किला भी ठाकुरों का नहीं रहा। नब्बे के दशक से उदारीकरण की शुरुआत के बाद लोगों के जीवन में भारी बदलाव आया है। सामान्य ढाणी में ब्याह -शादी के अवसर पर महादेव लिखी हजार पांच सौ गाङियां तो मिल ही जाएगी। 48 में देश आजाद हुआ, 77 साल में कई बदलाव आए हैं। लोकशाही मजबूत हुई है। 77 साल बाद भी एक पोस्ट ग्रेजुएट कद्दावर कांग्रेस नेता विधानसभा में बजट को ठाकुर का कुआ कह रहा है। बजट राजघरानों से जुङी व जनता द्वारा निर्वाचित एक महिला ने पढा था। वही महिला जिसके पिता को कांग्रेस ने जयपुर से लोकसभा का टिकट दिया था। जिस कांग्रेस में हरीश चौधरी पंजाब के प्रभारी रहे, उसी कांग्रेस में अलवर राजघराने से जुड़े भंवर जितेंद्र सिंह मजबूत किरदार निभाते हैं। दिग्विजय सिंह कांग्रेस को गाइड करते हैं। जोधपुर राजघराने से जुङी चंद्रेश कुमारी केन्द्र में मंत्री रही हैं। कोटा र...

लोकसभा चुनाव परिणाम 2024

 “सदा न संग सहेलियाँ, सदा न राजा देश।  सदा न जुग में जीवणा, सदा न काला केश। सदा न फूलै केतकी, सदा न सावन होय। सदा न विपदा रह सके, सदा न सुख भी होय। सदा न मौज बसन्त री, सदा न ग्रीष्म भाण। सदा न जोवन थिर रहे, सदा न संपत माण। सदा न काहू की रही, गल प्रीतम की बांह। ढ़लते ढ़लते ढ़ल गई, तरवर की सी छाँह।“ लेकिन राजनीति में हमेशा स्थायित्व की उम्मीद की जाती है। दस सालों में बेदाग छवि, 370 निरस्तिकरण, कोरोना वेक्सीनेसन, मन्दिर प्राण-प्रतिष्ठा, बढती रेल सुविधाएं, बढता आयुद्ध निर्यात, सेना को बढ़ते हथियार, बढी हुई जीडीपी, ऊंचाइयों पर शेयर मार्केट और ब्रांड मोदी ऐसे फेक्टर थे जो फिर से मोदी सरकार की उम्मीद की जा रही थी।  लेकिन भाजपा का रथ 240 पर अटक गया। अब 33 की जरूरत। हालांकि एनडीए 292 पर, पर अब फ्री हैंड कहां? अब गठबंधन सरकार होगी और उसका दवाब होगा। हो सकता है वन नेशन वन इलेक्शन, यूसीसी सहित कई कोर मुद्दों को स्थगित करना पङे।  जीत के कम अंतर को भाजपा बङी बारिकी से विश्लेषण करेगी। नजर 29 पर रखेगी। हो सकता है भाजपा यूपी, महाराष्ट्र, राजस्थान और हरियाणा पर खास फोकस करेगी। इसलिए राजस...

लोकसभा चुनाव 24

 अपनी दिनचर्या के तहत 07.30 बजे छत पर जब चिड़िया को चुग्गा डाल रहा था तो नीचे खङे 80 वर्षीय बुजुर्ग पङौसी ने बताया कि वो वोट कर आ गए हैं।  बताया कि पहला वोट उन्हीं का था। मतपेटी को हाथ जोड़कर उन्होंने बटन दबाया। यह हमारी आस्था है, विश्वास है और श्रद्धा है। नागौर में वोट इस बार राम मंदिर को हुआ है। लोगों ने वोट नहीं डाला, रामजी को भेंट अर्पित की है। वोट करने के बाद मतदाता अपने को हल्का महसूस कर रहे थे। शाम छः बजे बाद युवाओं के एक समूह में जीत की बधाइयां शेयर की जा रही थी। यह भी एक श्रृद्धा और विश्वास है। सुबह से ही सुस्त रही रफ्तार ने यह अंदेशा दे दिया था कि वोट कास्टिंग कम ही रहेगी। शाम को जारी आंकड़ों ने बता दिया कि 54 से 60 के बीच विभिन्न विधानसभाओं में मतदान हुआ। कम मतदान को लेकर विश्लेषक अंदाजे लगाने लगे।  नागौर को लेकर हमारा अंदाजा है कि आस्था और श्रद्धा की जीत होगी। जीत भी अच्छे खासे अंतराल से होगी। सवाल जब श्रद्धा का आता है तो तमाम शिकायतें बेमानी हो जाती है कि वो जाट है, वो कांग्रेस बेकग्राऊंड से है, इसी एक परिवार का ठेका है क्या, चुनाव प्रचार में मेरी पूछ नहीं हु...

चुनावी मुद्दे

 हमारे खाते सीज किए जा रहे हैं, हमारे नेताओं पर ईडी कार्रवाई कर रही है, ये संविधान बदल देंगे, धमका कर इलेक्ट्रोल बोंड के माध्यम से चंदा ले रहे है!! विपक्ष के ये मुद्दे हैं।  कानून का हम सम्मान करेंगे नहीं, समय पर टेक्स रिटर्न दाखिल करेंगे नहीं और विभाग कार्रवाई करेगा तो हम चिल्लाएंगे कि देखो हमारे पर कार्रवाई हो रही है। देश में कानून का राज है, तुम कानून से ऊपर थोङे ही हो। यदि गलत है तो कोर्ट है ना! तुम सत्ता में थे तो करोङों की सम्पत्ति बनाई। लेकिन कहीं छेद रख दिए तो ईडी को मौका मिल जाता है। सब एक नंबर में रहे तो ईडी क्या करेगी, लेकिन गलतियां तुम्हारी और रोओ भी तुम ही। भुगतते रहो। संविधान बदल देंगे। सत्ता में थे तो तुमने भी नब्बे से ऊपर संशोधन किए थे। जहां संशोधन की जरूरत है, दो तिहाई बहुमत से संशोधन करना ही चाहिए। संसद का काम ही कानून बनाना है। जो दल सत्ता में है, उसे चंदा मिलेगा ही। राजनैतिक पार्टियों कोई कमाने थोङे ही जाती है। चंदा तो तृणमूल को भी मिला है, वीआरएस को भी मिला है। सभी को मिला है। और तरीके से दिया चंदा वैध है चाहे ईडी के डर से ही क्यूं न दिया हो। फिर मुद्दे क्...

होली की शुभकामनाएं

 बसंत और ग्रीष्म ऋतु की संधि काल में आया होली का पर्व आह्लाद का, आनंद का और मस्ती का त्योहार है।  भीतर के कुत्सित विकारों को गायन, वादन और नृतन से जब हम बाहर प्रकट करते हैं तो जीवन में रंग निखर आते हैं। हमारी सनातन परंपरा में यह समरसता का त्योहार है। मनोवेग, मनोविकार और मानसी रोगों को शमन करने का यह अध्यात्मिक उपहार है। सभी ईष्ट मित्रों एवं देवतुल्य मतदाताओं को इस रंग भरे बासंती पर्व की उल्लास व आनंद भरी शुभकामनाएं, अभिनंदन एवं राम राम। त्योहार लोकतंत्र के पर्व के बीच आया है। बङी कशमकश के बाद कल रात कांग्रेस ने नागौर गठबंधन में छोङा, अभी बांसवाड़ा और होल्ड पर कर रखा है। नागौर में जाटों के बाद राजपूत, मेघवाल, माली, मुसलमान, ब्राह्मण - बणियों का लगभग बराबर धङा। परबतसर और लाडनूं में राजपूत प्रत्याशियों की हार ने राजपूतों का रुख जाट विरोधी है। हो सकता है इस चुनाव में निर्दलीय राजपूत भी मैदान में आ जाए। अशोक गहलोत की माली समाज में अब भी सुनी जाती है, कोई शक नहीं कि वे हनुमान के लिए इशारा जरुर करेंगे। गठबंधन होने के कारण हाथ को देवता मानने वाले इस बार जरूर संकट में रहेंगे। हो सकता ह...

भाजपा की पहली मीटिंग

 तो रणभेरी बज ही गई। कल राना मार्बल प्रांगण में भाजपा की बूथ स्तरीय कार्यकर्ता बैठक हुई। बैठक में जिला के प्रभारी मंत्री कन्हैयालाल चौधरी, किसान आयोग अध्यक्ष सी आर चौधरी और नागौर से भाजपा प्रत्याशी डॉ ज्योति मिर्धा ने शिरकत की। नेता आए तो कार्यकर्ताओं ने भी खूब सेल्फियां ली और फेसबुक पर शेयर की।  बैठक में भीङ खूब उमङी। किसी ने बताया कि इतनी भीड़ तो अमित शाह की मीटिंग में भी नहीं थी। सारी भीड़ ग्रामीण क्षेत्र की।  चुनाव में कार्यकर्ताओं के जोश को ऐसी बैठकें उसे चार्ज कर देती है। 02 मार्च को ज्योति मिर्धा का नाम डिक्लेयर हुआ और करीब 20 दिन बाद उन्होंने कोई बङी मीटिंग की। दरअसल मीटिंग्स से माहौल बनता है। इन बीस दिनों में कांग्रेस नाम घोषित नहीं कर पाई तो भाजपा के सामने नैरेटिव गढ़ने का अच्छा समय था। अब तक का तो माहौल यही है कि आएगा तो मोदी ही लेकिन सीटों पर कयास लगाया जा रहा है। मैं समझता हूं राजस्थान में तो लोग सत्ता के साथ चलना पसंद करेंगे। लेकिन तीन चार सीटों पर संघर्ष कांटे का होगा जिसमें नागौर भी शामिल है। आप मेरे ब्लॉग मेरे फेसबुक पेज Devesh Swami Official for Marble H...

कांग्रेस की मजबूरी

 मिशन 156 याद है आपको! 156 वाले आजकल गठबंधन कर रहे हैं। जिस सीपीएम को लोग भूल गए थे, उसे सीकर में पुनर्जीवित किया जा रहा है। जिसका न कोई एमएलए न कोई प्रधान, उस पार्टी को डोटासरा ओक्सीजन दे रहे हैं। राजेन्द्र पारीक की पावली जो खत्म करनी है।  कल देर रात कांग्रेस द्वारा घोषित तीसरी लिस्ट में पांच नाम और डिक्लेयर हुए लेकिन कसवां की तरह गुंजल घोषणा में लीड नहीं पा सके। उम्मीद थी कि जयपुर में माइनोरिटी को मौका मिल सकता है लेकिन जोखिम नहीं लिया गया और जाती के सामने जाती वाला जोधपुर फार्मूला यहां भी लागू हो गया। राजनीति में इशारे होते हैं। कसवां बागी हुए तो कांग्रेस ने टिकट दे दी, यही मापदंड गुंजल के लिए। सीकर गठबंधन में गई तो यही मापदंड नागौर और बांसवाडा के लिए।  आखिर कांग्रेस क्यूं नागौर गठबंधन में देना चाह रही है। सिर्फ गहलोत के एक गलत निर्णय के कारण। जोधपुर गहलोत का गृह क्षेत्र। सरकार होते हुए भी बेटे को नहीं जिता सके। बाद में जोधपुर को खूब सुविधाएं दी। जाट वोटों के लिए हनुमान बेनीवाल को साधा। जोधपुर में जाट, राजपूत, मियां, माली व मेघवाल लगभग बराबर स्थिति में। गहलोत की तुष्टि...

पेपर लीक प्रकरण

 पेपर लीक मामले में आरोपी कितना ही बड़ा हो, बख्शा नहीं जाएगा - राष्ट्रदूत की इस खबर से कुछ उम्मीद जगी है। तीन दिन पूर्व एसओजी टीम के साथ भजनलाल ने मीटिंग की थी। मीटिंग में मुख्यमंत्री ने कहा कि भर्ती चाहे 21 की हो या 14 की, नकल से लगे अभ्यार्थियों को उठा लीजिए। दरअसल सप्ताह भर पूर्व मैंने लिखा था कि ये थानेदार पकङे गए हैं, गेम्बलर बच रहे हैं। और मैंने कयास लगाया था कि जैसा कि इस देश की परम्परा है, होने वाला कुछ नहीं है। किसी भी टीम के साथ मुखिया यूं मुलाकात नहीं किया करते हैं सिर्फ लीडर से ब्रीफ लिया करते हैं और टास्क के प्रति अपनी मंशा जाहिर करते हैं। लेकिन मुखिया जी ने टीम से मुलाकात कर पारदर्शिता की शुरुआत की है। इससे टीम का निश्चय ही मनोबल बढ़ेगा। लेकिन जैसा कि मैंने पूर्व में लिखा था कि एसओजी में भी इंसान ही है। किसी का बसा बसाया घर उजाङने से पूर्व अधिकारी को सो बार सोचना होगा। लेकिन मामले में पेंच डॉ किरोड़ी लाल मीणा का है। डॉ मीणा ने एसओजी से अलग से मुलाकात कर कुछ हिंट दिए हैं। तो एसओजी को अब उन हिंट पर ही काम करने की छूट मिल गई है। किसी नेता के खिलाफ पुख्ता सबूत तो मिलने से...

सस्ता हुआ पेट्रोल

 पर्ची सरकार ने आखिरकार पेट्रोल डीजल पर वैट कम कर ही दिया। फ्री रेवङियों की बरसात करने वाले गहलोत से भी बहुत मिन्नतें की थी पर उन्होंने सीधे कहा कि सरकार चलाने के लिए रेवेन्यू चाहिए। रूस से सस्ती खरीद में आ रहा क्रूड आखिर हम महंगा क्यूं खरीदें। 31 प्रतिशत वैट कम नहीं होता। फिर टोल एवं एक सेस अलग। महंगाई की आधी वजह तो यह डीजल पेट्रोल है। लेकिन रेवङियां बांटने के लिए उसी जनता का खून चूसना जरुरी हो जाता है। तो पर्ची सरकार ने विपक्ष का जवाब पोजीटिव मूड में दिया है। अब भी राजस्थान में पङौसी राज्यों से दरें ज्यादा है। मिनरल स्टेट होने के बावजूद डीजल पेट्रोल पर वैट के भरोसे रहना कहां तक उचित है। मुझे लगता है वैट में अब और कटौती 28 में ही होगी। फिर भी हिम्मत दिखाने के लिए हम भजन लाल सरकार की प्रशंसा करते हैं। आप मेरे ब्लॉग मेरे फेसबुक पेज Devesh Swami Official for Marble Handicraft and Organic Farming पर भी देख सकते हैं।